विज्ञान की डोर तर्क से बंधी है, जबकि आस्था की डोर विश्वास से….
वैज्ञानिक मंदिर के पुजारी को चुनौती दे रहे थे कि वो बर्तन को खाली करें और उसमें नए सिरे से नदी का पानी भरें. तभी ये साफ हो पाएगा कि दीपक वाकई पानी से जल रहा है या नहीं.
जलते हुए दीपक को देखकर हिंगलाज माता मंदिर के कर्मचारियों की तसल्ली बढ़ चुकी थी लेकिन  टीम को अपने सवाल का जवाब मिल चुका था कि चमत्कार नदी के पानी में नहीं है. दरअसल कहानी कुछ और ही है.

हालांकि चमत्कार की ये पहेली अब भी इस दीपक और देवी की महिमा के बीच उलझी हुई थी. घंटों की मशक्कत के बाद टीम ने विज्ञान के दो जानकारों को बुलाया और फैसला किया कि आस्था की इस कहानी को अब विज्ञान के नज़रिए से सुलझाएंगे. जलते हुए दीपक के रहस्य को विज्ञान की कसौटी पर जांचने के लिए टीम के साथ रुचिका और आयुष हैं, जो इस बात की वैज्ञानिक पड़ताल करेंगे कि आखिर कैसे ये चमत्कार हो सकता है. विज्ञान और आस्था में टकराव की जमीन तैयार होने लगी.
परीक्षण के लिए विशेषज्ञों ने दो दीपक तैयार किए. पहले दीये में बाहर का तेल डाला और दूसरे दीपक में उस पानी को भरा गया, जिससे मंदिर की ज्योत जल रही है. वैज्ञानिकों ने दोनों तरह के दीपक में काली सिंध नदी का पानी डाला. इस पड़ताल के नतीजे ने वैज्ञानकों को भी उलझा दिया क्योंकि मंदिर में रखे बर्तन में नदी का पानी पूरी तरह घुल रहा था.

जबकि बाहर से लाए गए दीये में ये पानी बिल्कुल नहीं घुला यानी तेल और पानी की अलग-अलग परतें साफ दिखाई दे रही थीं. ये पूरा मामला अब विज्ञान की समझ के भी बाहर था. जलते हुए दीपक की पहेली और उलझ गई. मतलब साफ था कि पहेली मंदिर में मौजूद इस बर्तन में छिपी थी. जिसमें बाहर से डाला गया पानी बार-बार घुल रहा है यानी सारा खेल उस पानी में है, जो मंदिर के दीपक में मौजूद है.
वैज्ञानिक मंदिर के पुजारी को चुनौती दे रहे थे कि वो बर्तन को खाली करें और उसमें नए सिरे से नदी का पानी भरें. तभी ये साफ होगा कि दीपक वाकई पानी से जल रहा है या नहीं. लेकिन मंदिर के पुजारी आस्था का हवाला देकर इस पड़ताल से इंकार कर दिया. विज्ञान के जानकार बार-बार मंदिर के उस बर्तन को खाली करने की गुजारिश करते रहे लेकिन पुजारी इस प्रयोग के लिए कतई तैयार नहीं हुए.

वैज्ञानिकों के मुताबिक मंदिर में होने वाली घटना, कोई चमत्कार नहीं बल्कि विज्ञान का एक मामूली सा सिद्धांत है. वो मानते हैं कि मंदिर के बर्तन में पानी के साथ-साथ तेल भी मिलाया गया है. विज्ञान के नियम कहते हैं कि पानी का घनत्व तेल से ज्यादा होता है और अगर किसी बर्तन में तेल और पानी को एक साथ मिलाया जाए, तो घनत्व ज्यादा होने के कारण पानी नीचे चला जाएगा और तेल पानी की ऊपरी सतह पर तैरता रहेगा.

वैज्ञानिकों के मुताबिक कुछ ऐसा ही इस मंदिर में भी होता है. बर्तन में पानी और तेल साथ-साथ मिलाया गया है. पानी बर्तन के नीचे चला जाता है और तेल की परतें ऊपरी सतह पर आ जाती हैं. जब तक थाली में तेल मौजूद रहता है, ज्योत जलती रहती है. यानी विज्ञान की डोर तर्क से बंधी है और आस्था की डोर विश्वास से. ऐसे में आपको कौन सी डोर थामनी है ये आपको खुद ही तय करना है.

44 thoughts on “चमत्कार पानी से जलता दीपक”
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