कभी लालबत्ती में घूमने वाली आदिवासी समुदाय की महिला आज बकरी चराने को मजबूर..

शिवपुरी| वक्त की फितरत है पलट जाना और कई बार यह ऐसा पलटता है कि इंसान को अर्श से फर्श पर ला पटकता है। राजनीति के सफर में हर कोई ऊंची उड़ान भरने का सपना देखता हैं, लेकिन समय अगर साथ न दे तो गुमनामी के अन्धकार में खो जाता है|कुछ इसी तरह का एक उदहारण सामने आया है मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले से, जहां एक महिला जो कभी लाल बत्ती वाली गाडी में घूमा करती थीं और कभीअफसर जिसे सलाम ठोकते थे, आज वो गुमनामी के अन्धकार में खो सी गई है और आज हालात यह है कि वह बकरी चरा कर अपना और अपने परिवार का गुजर बसर करने को मजबूर है|

रिकार्ड में इंदिरा आवास योजना का मिल गया लाभ, वास्तविक स्थिति मैं बेघर है जुली……

शिवपुरी जिला पंचायत अध्यक्ष रही जूली आदिवासी आज भ्रष्टाचार के कारण बकरी चराकर अपना जीवन यापन कर रही हैं , बदरवास जनपद की ग्राम पंचायत रामपुरी के ग्राम लुहारपुरा में रहने वाली जूली आदिवासी भ्रष्टाचार की सजा भुगत रही है, उन्हें इंदिरा आवास योजना के तहत कुटीर तो स्वीकृत हुई परंतु वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। एक घर के लिए भी उन्हें भटकना पड़ रहा है| जिला पंचायत अध्यक्ष बनते ही उनके दिन फिर गए थे, लेकिन आज सिर पर छत भी नसीब नहीं| एक अख़बार को जूली आदिवासी ने बताया कि उनके दो लड़कियां तथा तीन लडक़े हैं। जब वह जिला पंचायत अध्यक्ष बनी तो उसके सभी बच्चों का एडमीशन अधिकारियों ने प्रायवेट स्कूल में करवा दिया था, वह पढऩे जाते थे और उन्हें पढ़ाने के लिए टीचर भी आता था। आज वही बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं।

इस तरह बदल गई थी जूली की किस्मत……..

जूली आदिवासी की किस्मत तब बदली थी जब कोलारस के पूर्व विधायक रामसिंह यादव के यहां वो मजदूरी करती थी और जूली आदिवासी को उन्होंने वर्ष 2005 में जिला पंचायत के वार्ड क्रमांक- से जिला पंचायत सदस्य बनवाया था, इसके बाद में शिवपुरी के पूर्व विधायक वीरेन्द्र रघुवंशी ने उसे जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुँचाया, इसके बाद पांच साल तक महिला को राज्य मंत्री का दर्जा मिला और अफसर उन्हें सलाम ठोकने लगे, तब लालबत्ती में उनका आना जाना शुरू हो गया| लेकिन समय ने झटका दिया और आज वही लालबत्ती में सफर करने वाली महिला पेट पालने के लिए बकरियां चरा रही है। सरकारी दस्तावेजों में तो उसे इंदिरा गांधी आवास योजना का लाभ मिल चुका है, परंतु जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी जमीन पर बनी उसकी झोंपड़ी भी रहने लायक नहीं है।

बकरी चराकर पाल रही पेट

एक अखबार को जूली ने बताया कि उसे आवास योजना की एक किस्त तो जारी कर दी गई परंतु उसके बाद एक रुपया भी नहीं मिला। इस कारण आवास बनाने के लिए खरीदी गई ईंटें भी जैसी की तैसी झोंपड़ी के बाहर रखी हुई हैं। जूली को एक बकरी चराने के एवज में 50 रुपए महीने मिलते हैं, वह इस समय 50 बकरियों को चराकर अपने परिवार का पालन कर रही है। उसके अनुसार जब बकरियां नहीं होती हैं तो वह मजदूरी करने खेतों पर चली जाती है और जब खेतों पर मजदूरी नहीं मिलती तो गुजरात जाकर मजदूरी करनी पड़ती है, ताकि पेट पाल सके। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री खुद को प्रदेश की तमाम महिलाओं को बहन और भांजी से संबोधित करते हुए नहीं थकते उनके ही मध्यप्रदेश में ये हाल है वह भी आदिवासी समुदाय के तो बाकी प्रदेश में किस तरह के हाल होंगे कमोबेश सारे प्रदेश में यह हाल है ।

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